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Jeevan sudha
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Product Description
काव्य को जीवन माना जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। मैंने जो जीवन जिया, मुझे जो मिला, जो खोया उसे शब्दों के रूप में काव्य की रचना की।कभी दुःख देखा तो कभी सुख की अनुभूति हुई इन सारी बातों को मन के किसी कोने में संजोये, शब्दों के रूप में अन्तःकरण से प्रस्फुटित होती गई। मन की पीड़ा, वेदनाएं, हर्ष और समाज में फैली कुरीतियाँ, भ्रष्टाचार को अंतस ने जब अनुभव किया तो वही मैं लिखता गया।प्रारंभिक दौर में जरूर श्रृंगार की रचना की प्रमुखता रही लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, श्रृंगार से हटकर सामाजिक चेतना, सृष्टि, सौंदर्य, मानवीय संवेदनाओं एवं राष्ट्रहित, देशभक्ति, जीवन दर्शन से ओत-प्रोत रचनाएं अंतस से निकलती गई।आज कविता अपने उत्कर्ष की ओर बढ़ रही है जिस तरह समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है ऐसे में कविता की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।स्कूल के दिनों में जब मैं हाईस्कूल में था तब से ही छोटी-छोटी रचना लिखना प्रारम्भ किया और वे अखबारों में प्रकाशित हो गई तो मेरा मनोबल और बढ़ता गया। मेरा रूझान आलेखों की तरफ प्रेरित हुआ। मेरे आलेख लगातार समाचार पत्रों में खासतौर पर 'लोकमत समाचार' नागपुर, नवभारत नागपुर में लगातार प्रकशित होने लगे। इसके पश्चात अन्य अखबार "एक्सप्रेस" जबलपुर, स्वतंत्र मत, 'जनपक्ष', राष्ट्रीय 'स्पूतनिक, चाणक्य आदि समाचार पत्रों में मेरी रचनाओं को प्राथमिकता दी जाने लगी।सन् 1992 से लेकर सन् 1997 तक लगातार रचनाओं के प्रकाशन का दौर चलता रहा। "आकाशवाणी" छिंदवाड़ा से भी मेरी रचनाओं का अनेकों बार प्रसारण हुआ।
Product Details
| ISBN 13 | 9789386498625 |
| Book Language | Hindi |
| Binding | Paperback |
| Total Pages | 96 |
| Author | SANTOSH BHAVARKAR NEER |
| Editor | 2018 |
| GAIN | NVLJSKF415M |
| Category | Books Children and Young Adults Story Books |
| Weight | 150.00 g |
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काव्य को जीवन माना जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। मैंने जो जीवन जिया, मुझे जो मिला, जो खोया उसे शब्दों के रूप में काव्य की रचना की।कभी दुःख देखा तो कभी सुख की अनुभूति हुई इन सारी बातों को मन के किसी कोने में संजोये, शब्दों के रूप में अन्तःकरण से प्रस्फुटित होती गई। मन की पीड़ा, वेदनाएं, हर्ष और समाज में फैली कुरीतियाँ, भ्रष्टाचार को अंतस ने जब अनुभव किया तो वही मैं लिखता गया।प्रारंभिक दौर में जरूर श्रृंगार की रचना की प्रमुखता रही लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, श्रृंगार से हटकर सामाजिक चेतना, सृष्टि, सौंदर्य, मानवीय संवेदनाओं एवं राष्ट्रहित, देशभक्ति, जीवन दर्शन से ओत-प्रोत रचनाएं अंतस से निकलती गई।आज कविता अपने उत्कर्ष की ओर बढ़ रही है जिस तरह समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है ऐसे में कविता की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।स्कूल के दिनों में जब मैं हाईस्कूल में था तब से ही छोटी-छोटी रचना लिखना प्रारम्भ किया और वे अखबारों में प्रकाशित हो गई तो मेरा मनोबल और बढ़ता गया। मेरा रूझान आलेखों की तरफ प्रेरित हुआ। मेरे आलेख लगातार समाचार पत्रों में खासतौर पर 'लोकमत समाचार' नागपुर, नवभारत नागपुर में लगातार प्रकशित होने लगे। इसके पश्चात अन्य अखबार "एक्सप्रेस" जबलपुर, स्वतंत्र मत, 'जनपक्ष', राष्ट्रीय 'स्पूतनिक, चाणक्य आदि समाचार पत्रों में मेरी रचनाओं को प्राथमिकता दी जाने लगी।सन् 1992 से लेकर सन् 1997 तक लगातार रचनाओं के प्रकाशन का दौर चलता रहा। "आकाशवाणी" छिंदवाड़ा से भी मेरी रचनाओं का अनेकों बार प्रसारण हुआ।
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| ISBN 13 | 9789386498625 |
| Book Language | Hindi |
| Binding | Paperback |
| Total Pages | 96 |
| Author | SANTOSH BHAVARKAR NEER |
| Editor | 2018 |
| GAIN | NVLJSKF415M |
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