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Ram Mandir Nirman Ki Kaamna Aur Puran Kaaj: राम मंदिर निर्माण की कामना और पूरन काज
Ram Mandir Nirman Ki Kaamna Aur Puran Kaaj: राम मंदिर निर्माण की कामना और पूरन काज
Product Description

-:किताब के बारे में:-

"श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति का संघर्ष आधुनिक भारत के पुनर्जागरण का एक गौरवशाली अध्याय है। न्यायमूर्ति कमलेश्वर नाथ द्वारा 96 वर्षों के इस संघर्ष का प्रस्तुत वृत्तांत अत्यंत महत्वपूर्ण है। इतिहास के इस अध्याय को स्मृति में संजोकर आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाया जाना चाहिए।"

- डॉ. मोहन भागवत

सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

"राम मंदिर से संबंधित कानूनी संघर्ष पर यह मेरे द्वारा पढ़ी गई सबसे प्रामाणिक पुस्तकों में से एक है।"

श्री चम्पत राय

महासचिव, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट

"राम मंदिर का विध्वंस केवल एक संरचना का ध्वंस नहीं था, बल्कि भारत की चेतना पर आघात था। उसी क्षण उसके पुनर्निर्माण की अभिलाषा जन्मी, जो पाँच शताब्दियों तक जीवित रही। न्यायालय के लिए यह एक विधिक प्रश्न हो सकता था, किंतु करोड़ों लोगों के लिए यह आस्था और आध्यात्मिकता का विषय था। प्रत्यक्ष अनुभवों पर आधारित यह पुस्तक दीर्घकालिक न्यायिक संघर्ष और उसकी विजय का महत्वपूर्ण दस्तावेज है।"

- डॉ. नीरजा गुप्ता

शिक्षाविद् एवं कुलपति, गुजरात विश्वविद्यालय

अयोध्या स्थित भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर प्राचीन काल से विष्णु-हरि मंदिर विद्यमान था। 16वीं शताब्दी में बाबर के सेनापति मीर बाकी ने मंदिर स्थल पर मस्जिद का निर्माण कराया, जो आगे चलकर बाबरी मस्जिद कहलायी। इसके बावजूद हिन्दू समाज ने राम जन्मभूमि पर अपनी आस्था और पूजा-अर्चना की परंपरा को निरंतर बनाए रखा। यह संघर्ष अनेक बलिदानों और न्यायिक लड़ाइयों से होकर गुजरा। यह पुस्तक उन महत्वपूर्ण न्यायिक प्रयासों और घटनाओं का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करती है, जिनके परिणामस्वरूप रामलला के जन्मस्थान पर भव्य राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। यह पुस्तक आस्था और बर्बरता के संघर्ष का जीवंत और प्रामाणिक दस्तावेज़ है।

-:अनुवादक परिचय:-

डॉ. दीनदयाल का उनका जन्म 4 जून 1975 को दिल्ली में एक संभ्रांत परिवार में हुआ। इन्होंने अपनी शिक्षा-दीक्षा दिल्ली में ही पूर्ण की। शिक्षा के क्षेत्र में उनकी यात्रा वर्ष 1995 में दिल्ली विश्वविद्यालय के बीए (ऑनर्स) हिंदी से शुरू हुई, जिसके बाद उन्होंने वर्ष 1998 में एम.ए.(हिंदी) और वर्ष 1999 में एमफिल की डिग्री प्राप्त की। इनका शोध कार्य हमेशा साहित्य और भाषा के गहरी पहलुओं की ओर केंद्रित रहा है। वर्ष 2003 में इन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि मिली, जिसमें इन्होंने "रीतिकालीन नीतिकाव्य में कला तत्व" पर अपना शोध कार्य किया। जोकि उनके गहरे साहित्यिक ज्ञान और विश्लेषण की छवि को दर्शाता है। डॉ दीनदयाल जी ने अपनी लंबी शैक्षिक यात्रा में अन्य कई महत्वपूर्ण पड़ाव पार किए। वर्ष 2009 में उन्होंने एम.ए. (हिंदी पत्रकारिता) की डिग्री प्राप्त की। इसके अतिरिक्त उन्होंने केंद्रीय हिंदी संस्थान से ‘अनुपयुक्त भाषा विज्ञान’ में भी परा-स्नातकोतर उपाधि प्राप्त की। उन्होंने नैट और स्लैट जैसी परीक्षाएं भी उत्तीर्ण की। इन्होने विभिन्न विश्वविद्यालयों के लिए अध्ययन सामग्री भी तैयार की। शोध प्रबंधों का मार्गदर्शन करने और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए भी ये निष्ठावान रहे। इन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में विभिन्न शोध-पत्र प्रस्तुत किए, जिनमें "प्रवासी हिंदी साहित्य", "भारत में हिंदी पत्रकारिता" और "हिंदी सिनेमा और समाज" जैसे विषय शामिल हैं। डॉ. दीनदयाल हिंदी साहित्य के इतिहास, काव्य और गद्य के विश्लेषण में भी गहरी रुचि रखते हैं। इनके द्वारा प्रकाशित पुस्तकों की सूची बहुत विस्तृत है, जिसमें काव्य, गद्य, सिनेमा और सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर कई महत्वपूर्ण पुस्तक शामिल हैं। जिनमें "काव्य प्रवाह", "व्यावहारिक हिंदी", "धूमिल की पटकथा", "मध्यकालीन काव्य" आदि मुख्य हैं। डॉ. दीनदयाल जी की कार्यशैली में उनके बहुमुखी योगदान का अहम स्थान है। उन्होंने न केवल शैक्षिक दुनिया में अपना नाम कमाया है अपितु सामुदायिक कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाई है। उनकी लेखन और संपादन के क्षेत्र में लंबी यात्रा रही है, जिसमें विभिन्न कॉलेज पत्रिकाओं में कविता लेख और निबंध प्रकाशित हुए हैं। इन्हें शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं जिनमें "मौलाना अबुल कलाम आजाद एक्सीलेंस अवॉर्ड फॉर एजुकेशन", "चाणक्य सम्मान", "रामधारी सिंह दिनकर सम्मान" और "विश्व हिंदी सम्मान" जैसे प्रमुख सम्मान शामिल है। उनका जीवन समर्पण संघर्ष का प्रतीक है जो हर किसी को प्रेरित करता है। डॉ. दीनदयाल जी की शैक्षिक यात्रा केवल उनके व्यक्तिगत प्रयासों का परिणाम नहीं, बल्कि उनके समर्पण और शिक्षक के रूप में लगातार प्रगति का प्रतीक है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के कई नामी कॉलेजों में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्य किया है। वर्तमान में वे जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज में सहायक प्रोफेसर के तौर पर कार्यरत हैं।

Product Details
ISBN 13 9789347691515
Book Language Hindi
Binding Paperback
Publishing Year 2026
Total Pages 180
Edition First
GAIN 41Y68UNMI5W
Publishers Garuda Prakashan Pvt Ltd  
Category Biographies, Diaries & True Accounts   True Accounts  
Weight 170.00 g
Dimension 14.00 x 22.00 x 1.10

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-:किताब के बारे में:-

"श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति का संघर्ष आधुनिक भारत के पुनर्जागरण का एक गौरवशाली अध्याय है। न्यायमूर्ति कमलेश्वर नाथ द्वारा 96 वर्षों के इस संघर्ष का प्रस्तुत वृत्तांत अत्यंत महत्वपूर्ण है। इतिहास के इस अध्याय को स्मृति में संजोकर आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाया जाना चाहिए।"

- डॉ. मोहन भागवत

सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

"राम मंदिर से संबंधित कानूनी संघर्ष पर यह मेरे द्वारा पढ़ी गई सबसे प्रामाणिक पुस्तकों में से एक है।"

श्री चम्पत राय

महासचिव, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट

"राम मंदिर का विध्वंस केवल एक संरचना का ध्वंस नहीं था, बल्कि भारत की चेतना पर आघात था। उसी क्षण उसके पुनर्निर्माण की अभिलाषा जन्मी, जो पाँच शताब्दियों तक जीवित रही। न्यायालय के लिए यह एक विधिक प्रश्न हो सकता था, किंतु करोड़ों लोगों के लिए यह आस्था और आध्यात्मिकता का विषय था। प्रत्यक्ष अनुभवों पर आधारित यह पुस्तक दीर्घकालिक न्यायिक संघर्ष और उसकी विजय का महत्वपूर्ण दस्तावेज है।"

- डॉ. नीरजा गुप्ता

शिक्षाविद् एवं कुलपति, गुजरात विश्वविद्यालय

अयोध्या स्थित भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर प्राचीन काल से विष्णु-हरि मंदिर विद्यमान था। 16वीं शताब्दी में बाबर के सेनापति मीर बाकी ने मंदिर स्थल पर मस्जिद का निर्माण कराया, जो आगे चलकर बाबरी मस्जिद कहलायी। इसके बावजूद हिन्दू समाज ने राम जन्मभूमि पर अपनी आस्था और पूजा-अर्चना की परंपरा को निरंतर बनाए रखा। यह संघर्ष अनेक बलिदानों और न्यायिक लड़ाइयों से होकर गुजरा। यह पुस्तक उन महत्वपूर्ण न्यायिक प्रयासों और घटनाओं का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करती है, जिनके परिणामस्वरूप रामलला के जन्मस्थान पर भव्य राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। यह पुस्तक आस्था और बर्बरता के संघर्ष का जीवंत और प्रामाणिक दस्तावेज़ है।

-:अनुवादक परिचय:-

डॉ. दीनदयाल का उनका जन्म 4 जून 1975 को दिल्ली में एक संभ्रांत परिवार में हुआ। इन्होंने अपनी शिक्षा-दीक्षा दिल्ली में ही पूर्ण की। शिक्षा के क्षेत्र में उनकी यात्रा वर्ष 1995 में दिल्ली विश्वविद्यालय के बीए (ऑनर्स) हिंदी से शुरू हुई, जिसके बाद उन्होंने वर्ष 1998 में एम.ए.(हिंदी) और वर्ष 1999 में एमफिल की डिग्री प्राप्त की। इनका शोध कार्य हमेशा साहित्य और भाषा के गहरी पहलुओं की ओर केंद्रित रहा है। वर्ष 2003 में इन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि मिली, जिसमें इन्होंने "रीतिकालीन नीतिकाव्य में कला तत्व" पर अपना शोध कार्य किया। जोकि उनके गहरे साहित्यिक ज्ञान और विश्लेषण की छवि को दर्शाता है। डॉ दीनदयाल जी ने अपनी लंबी शैक्षिक यात्रा में अन्य कई महत्वपूर्ण पड़ाव पार किए। वर्ष 2009 में उन्होंने एम.ए. (हिंदी पत्रकारिता) की डिग्री प्राप्त की। इसके अतिरिक्त उन्होंने केंद्रीय हिंदी संस्थान से ‘अनुपयुक्त भाषा विज्ञान’ में भी परा-स्नातकोतर उपाधि प्राप्त की। उन्होंने नैट और स्लैट जैसी परीक्षाएं भी उत्तीर्ण की। इन्होने विभिन्न विश्वविद्यालयों के लिए अध्ययन सामग्री भी तैयार की। शोध प्रबंधों का मार्गदर्शन करने और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए भी ये निष्ठावान रहे। इन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में विभिन्न शोध-पत्र प्रस्तुत किए, जिनमें "प्रवासी हिंदी साहित्य", "भारत में हिंदी पत्रकारिता" और "हिंदी सिनेमा और समाज" जैसे विषय शामिल हैं। डॉ. दीनदयाल हिंदी साहित्य के इतिहास, काव्य और गद्य के विश्लेषण में भी गहरी रुचि रखते हैं। इनके द्वारा प्रकाशित पुस्तकों की सूची बहुत विस्तृत है, जिसमें काव्य, गद्य, सिनेमा और सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर कई महत्वपूर्ण पुस्तक शामिल हैं। जिनमें "काव्य प्रवाह", "व्यावहारिक हिंदी", "धूमिल की पटकथा", "मध्यकालीन काव्य" आदि मुख्य हैं। डॉ. दीनदयाल जी की कार्यशैली में उनके बहुमुखी योगदान का अहम स्थान है। उन्होंने न केवल शैक्षिक दुनिया में अपना नाम कमाया है अपितु सामुदायिक कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाई है। उनकी लेखन और संपादन के क्षेत्र में लंबी यात्रा रही है, जिसमें विभिन्न कॉलेज पत्रिकाओं में कविता लेख और निबंध प्रकाशित हुए हैं। इन्हें शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं जिनमें "मौलाना अबुल कलाम आजाद एक्सीलेंस अवॉर्ड फॉर एजुकेशन", "चाणक्य सम्मान", "रामधारी सिंह दिनकर सम्मान" और "विश्व हिंदी सम्मान" जैसे प्रमुख सम्मान शामिल है। उनका जीवन समर्पण संघर्ष का प्रतीक है जो हर किसी को प्रेरित करता है। डॉ. दीनदयाल जी की शैक्षिक यात्रा केवल उनके व्यक्तिगत प्रयासों का परिणाम नहीं, बल्कि उनके समर्पण और शिक्षक के रूप में लगातार प्रगति का प्रतीक है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के कई नामी कॉलेजों में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्य किया है। वर्तमान में वे जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज में सहायक प्रोफेसर के तौर पर कार्यरत हैं।

Product Details
ISBN 13 9789347691515
Book Language Hindi
Binding Paperback
Publishing Year 2026
Total Pages 180
Edition First
GAIN 41Y68UNMI5W
Publishers Garuda Prakashan Pvt Ltd  
Category Biographies, Diaries & True Accounts   True Accounts  
Weight 170.00 g
Dimension 14.00 x 22.00 x 1.10

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