कहानियों की दुनिया में प्रवीण भारद्वाज ने इस छोटी सी किताब से दस्तक दी है।
अपनी कलम की स्याही से उपन्यास जगत की दहलीज़ में वे इस उम्मीद से दाखिल हो रहे हैं कि एक रोज़ वे भी इस साहित्यिक महासागर के कुशल नाविकों के साथ उनके जहाज़ के किसी कोने में खड़े होकर लहरों का सामना करेंगे।
मुफ़लिसी में नौकरी कर रहे लोगों को साहित्य का आउटसाइडर कहना ग़लत नहीं है। उस श्रेणी में अगर उन्हें कोई रखे तो एतराज़ नहीं होगा।
दिल्ली में जन्में और पले-बढ़े प्रवीण को साहित्य हमेशा से रोमांचित करता आया है। मजबूरी व्यक्ति का शौक न छुड़वा दे तो फिर ज़िंदगी का मजा ही क्या है! लेकिन कहते हैं कि शौक बड़ी चीज़ होती है, तो देखते हैँ कि बग़ैर किसी औपचारिक साहित्यिक शिक्षा के उनके सफ़र की ये पहली पुस्तक कहाँ तक उनकी हौसला अफ़ज़ाई करती है।